त्तीसगढ़ के हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में हफ़्ते भर से 'आज़ादी' के नारे गूंज रहे हैं.
यूनिवर्सिटी
में पढ़ाई-लिखाई और परीक्षा स्थगित है और 'पिंजरा तोड़ो' की मांग करते हुए
सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं विश्वविद्यालय की सीढ़ियों पर जमे
हुए हैं.
इनकी मांग है कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले
लड़के-लड़कियों को 24 घंटे कैंपस के भीतर कहीं भी आने-जाने की छूट मिले.
इसके अलावा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी भी 24 घंटे खुली रखी जाए. साथ ही
विश्वविद्यालय के कार्य परिषद की बैठकों की कार्रवाई सार्वजनिक की जाए.
प्रदर्शनकारियों
की मांग है कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की यौन प्रताड़ना के
लिये जिम्मेवार शिक्षकों को जांच तक निलंबित रखा जाए.
मांगों की एक
लंबी फ़ेहरिश्त है और आरोप हैं कि विश्वविद्यालय प्रबंधन इन मांगों को
अनसुना कर रहा है. लेकिन विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति रविशंकर शर्मा इन
आरोपों से इंकार कर रहे हैं.
शर्मा कहते हैं, "प्रदर्शनकारी छात्र अपनी 17 मांगों को लेकर हमारे पास
आए थे और हमने उसी समय 15 मांगों को पूरी तरह से मान लिया था.
विश्वविद्यालय में लड़कियों या लड़कों के हॉस्टल और कैंपस को रात भर खुला
रखने के मुद्दों पर भी मैंने यही कहा है कि यह नीतिगत मामला है और सुरक्षा
समेत तमाम मुद्दों पर विचार करने के बाद ही फ़ैसला लिया जा सकता है."
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और भारत के उपराष्ट्रपति रहे मोहम्मद
हिदायतुल्ला की स्मृति में साल 2003 में स्थापित इस आवासीय विश्वविद्यालय
में एलएलबी ऑनर्स और एलएलएम की पढ़ाई होती है.
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर इस विश्वविद्यालय
के कैंपस में लड़के और लड़कियों के हॉस्टल भी हैं, जहां देश भर के चयनित
छात्र रहते हैं.
शुरू से ही अलग-अलग विवादों में घिरे इस
विश्वविद्यालय में ताज़ा विवाद की शुरुआत 27 अगस्त को हुई, जब छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर डॉक्टर सुखपाल सिंह की दोबारा
नियुक्ति को अवैध मानते हुए उनकी नियुक्ति को निरस्त कर दिया.
डॉक्टर सुखपाल सिंह के दूसरे कार्यकाल की नियुक्ति को विश्वविद्यालय के ही एक प्रोफ़ेसर अविनाश सामल ने चुनौती दी थी.
जिस
दिन हाईकोर्ट का फ़ैसला आया, उसी शाम विश्वविद्यालय कैंपस में स्थित
लड़कियों के हॉस्टल के गेट पर रात साढ़े दस बजे के बाद ताला बंद करने पर
प्रदर्शन शुरू हो गया.
रात भर प्रदर्शन चला और फिर अगले दिन प्रदर्शन के साथ कुछ और मांगें जुड़ती चली गईं.
दो
दिन बाद राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ में विधि विभाग के प्रमुख सचिव रविशंकर
शर्मा को प्रभारी कुलपति बनाया. शर्मा की छात्रों से बातचीत भी हुई, लेकिन
छात्र अपनी मांगों को लेकर अड़े रहे.
इस पूरे विवाद पर विश्वविद्यालय में स्टूडेंट बार एसोसिएशन की उपाध्यक्ष
स्वाति भार्गव कहती हैं, "हमने पिछले साल भी छात्रों के हक़ में कुछ
मुद्दे उठाए थे. उस समय हमारी मांगों पर विचार करने की बात कही गई थी.
लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. इसलिए इस बार हमने तय किया कि जब तक
हमारी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, हम अपना आंदोलन जारी रखेंगे."
स्टूडेंट
बार एसोसिएशन के उप संयोजक आकांश जैन का दावा है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन
ने मांगों को गंभीरता से नहीं लिया और एक भी मामले में कोई कार्रवाई होती
नज़र नहीं आई. प्रभारी कुलपति ने हमारी मांगों को सुना ज़रूर, लेकिन पिछले
सात दिनों में कोई भी मांग पूरी नहीं हुई. इमेज कॉपीरइटक्षिण भारत की एक छात्रा ने बताया कि उन्हें शिक्षक ने अपने सामने नाच
कर दिखाने पर पांच दिन की उपस्थिति यूं ही दर्ज करने का प्रलोभन दिया. एक
अन्य छात्रा ने अपने शिक्षक पर परीक्षा में पास करने के बदले अपने कमरे में
बुलाने का आरोप लगाया.एक अन्य छात्रा ने कहा, "एक शिक्षक की बात
नहीं मानने पर मेरे घर आधी रात को फ़ोन कर कह दिया गया कि मैं रात को बाहर
घूमती हूं, शराब पीती हूं, ड्रग्स की आदि हूं. मेरे पिता को कहा गया कि वो
मुझे यहां से ले जाएं. ईश्वर का धन्यवाद है कि मेरे माता-पिता मुझ पर भरोसा
करते हैं. लेकिन क्या यह मानसिक प्रताड़ना किसी को भी अवसाद में डालने के
लिए काफ़ी नहीं है?"
विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति रविशंकर शर्मा
मानते हैं कि ऐसी शिकायतें उनके सामने आई थीं और प्रदर्शनकारी छात्र
सार्वजनिक तौर पर ऐसी शिकायतों पर बात करना चाह रहे थे.
शर्मा के
अनुसार, ''मैंने छात्रों को पीड़ित छात्राओं के नाम सार्वजनिक नहीं करने का
अनुरोध किया और उनसे कहा कि जो भी मामले हैं, उसकी लिखित में जानकारी दी
जाए जिससे कार्रवाई की जा सके. लेकिन मुझे अब तक एक भी शिकायत नहीं मिली
है."
हालांकि विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति रविशंकर शर्मा इससे इंकार करते
हैं. वे कहते हैं, "हमने 17 में से 15 मांगें मान ली हैं, लेकिन उनके
क्रियान्वयन के लिए थोड़ा समय तो चाहिए. कैंपस को 24 घंटे खुला रखने के
मुद्दे पर भी हमने कार्य परिषद में बात रखने का आश्वासन दिया था. लेकिन
जाने क्यों छात्र अड़े हुए हैं. "
विश्वविद्यालय में स्टूडेंट बार एसोसिएशन के प्रचार-प्रसार प्रभारी
अच्युत तिवारी का कहना है कि विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्राओं
ने यौन प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं. पिछले दो दिनों में 76 लड़कियों ने
लिखित में अपनी शिकायत दर्ज कराई है.
अच्युत तिवारी कहते हैं, "जब
शिक्षक लड़कियों को प्रताड़ित कर रहे हैं, तब आप लड़कियों से यह अपेक्षा
कैसे रख सकते हैं कि वे उनकी कक्षा में बैठ कर पढ़ाई करें? हम चाहते हैं कि
इस तरह के तमाम मामलों की जांच हो और जांच पूरी होने तक आरोपी शिक्षकों को
निलंबित किया जाए."
एक छात्रा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मेरे
शिक्षक मेरे कपड़ों को लेकर, परफ़्यूम को लेकर, शैंपू को लेकर क्लास रूम
में टिप्पणी करते रहे हैं. मुझे बार-बार कहा गया कि मैं केवल उन पर भरोसा
करूं, उनके कमरे में अकेले आऊं. मेरे सहपाठी के साथ बैठने पर कहा गया कि
तुम दोनों के बीच क्या रिश्ता है, क्या शादी करने वाले हो?"
फेसबुक में रिसर्चर्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करते हुए कम संसाधनों वाली भाषाएं जैसे ऊर्दू और बर्मी के सरल और
सटीक अनुवाद का तरीका विकसित किया है. एक जानकारी एक मीडिया रिपोर्ट के
हवाले से मिली है.
फोर्ब्स के मुताबिक, महत्वपूर्ण खोज को एम्पिरिकल मेथड्स इन नेचुरल
लैंग्वेज प्रोसेसिंग या में पेश किया जाएगा. फेसबुक के लिए ये खोज
महत्वपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि सोशल मीडिया
कंपनी दुनिया भर में यूजरों को उनकी पसंदीदा भाषा में पोस्ट पढ़ने में मदद
के लिए ऑटोमैटिक लैंग्वेज ट्रांसलेशन का इस्तेमाल करती है.
मौजूदा मशीनी अनुवाद प्रणाली कुछ भाषाओं में इंसानी स्तर के प्रदर्शन को हासिल कर सकती है, लेकिन उसके पास सीखने के लिए विभिन्न भाषाओं में एक ही वाक्य का अपार संग्रह होना चाहिए.
फेसबुक AI रिसर्च (FAIR) डिवीजन की टीम मशीन ट्रांसलेशन (MT) सिस्टम को ट्रेनिंग देने में कामयाब रही
है. इसमें विकिपीडिया जैसी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वेबसाइट्स से विभिन्न
भाषाओं के विभिन्न टेक्स्ट को फीड किया गया है. सबसे अहम यह है कि ये वाक्य
एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.
फेयर के पेरिस रिसर्च लैब के प्रमुख और शोधकर्मी एंटनी बोर्डस ने कहा कि
एक समानांतर संग्रह तैयार करना बहुत जटिल काम है क्योंकि इसके लिए दोनों
भाषाओं में पारंगत लोगों की जरूरत होती है. मसलन, पुर्तगाली/नेपाली का
समानांतर संग्रह तैयार करने के लिए इन दोनों भाषाओं में पारंगत लोगों की
जरूरत होती है और यह बेहद कठिन काम है. श के कई हिस्सों में बाढ़ और बारिश से हाहाकार मचा
हुआ है. अभी तक देश के दक्षिणी हिस्से से लगातार दिल दहलाने वाली खबरें आ
रही थीं, लेकिन अब उत्तरी राज्यों में भी कुदरत ने अपना रुख बदला है.
उत्तराखंड के मसूरी से रविवार को भारी बारिश से हाहाकार
मचा गया. राज्य के मसूरी में केम्पटी वाटरफॉल के पानी ने प्रलय का रूप
अख्तियार कर लिया. स्थानीय लोगों की मदद से पर्यटकों वहां से बाहर निकाला
गया. इस दौरान वाटरफॉल के आसपास की दुकानों में पानी भर गया. सुरक्षा के
मद्देनजर प्रशासन ने केम्पटी फॉल का रास्ता बंद कर दिया है.
सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि असम, अरुणाचल के बाद
काफी लंबे समय तक हुई बारिश के कारण सड़कें तालाब में बदल गईं. उत्तर
प्रदेश के शामली में एक तस्वीर सामने आई जहां अंडरपास में कई घंटों तक
ट्रैक्टर समेत अन्य कई वाहन फंसे रह गए. यूपी के ही ललितपुर में बेतवा नदी
पर ईरेक बांध के पास करीब 8 मछुआरे फंस गए. वायुसेना ने वहां जाकर रेस्क्यू
किया.
प्रदेश में जानलेवा बनी बारिश की वजह से 16 लोगों की
मौत हो गई तथा 12 अन्य जख्मी हो गए हैं. राहत आयुक्त कार्यालय से प्राप्त
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 24 घंटे के दौरान वज्रपात तथा बारिश के कारण मकान
गिरने इत्यादि वर्षाजनित हादसों में कुल 16 लोगों की मौत हो गई. इनमें
शाहजहांपुर में सबसे ज्यादा छह लोगों की मौत हो गई.भगवान श्री कृष्ण के बांके बिहारी रूप और बाल लीलाओं के लिए विख्यात मथुरा
जिले के वृंदावन में लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं. इसी वृंदावन में एक
ऐसी जगह भी मौजूद है जिसको लेकर मान्यता है कि वहां हर रात भगवान श्री
कृष्ण और राधा रास रचाने आते हैं.निधिवन के नाम से पहचानी जाने वाली इस जगह को लेकर कई ऐसी मान्याताऐं हैं,
जिन पर विश्वास करना कठिन है. जानिए निधिवन की मान्यताओं और उससे जुड़ी
रोचक कहानियों के बारे में.निधिवन में मौजूद पंडित और महंत बताते हैं कि हर रात भगवान श्री कृष्ण के
कक्ष में उनका बिस्तर सजाया जाता है, दातून और पानी का लोटा रखा जाता हैं.
जब सुबह मंगला आरती के लिए पंडित उस कक्ष को खोलते हैं तो लोटे का पानी
खाली, दातून गिली, पान खाया हुआ और कमरे का सामान बिखरा हुआ मिलता है. पौराणिक मान्यता है कि निधिवन बंद होने के बाद भी यदि कोई छिपकर रासलीला
देखने की कोशिश करता है तो वह पागल हो जाता हैं. मंदिर के महंत और आसपास के
लोग इससे जुड़े कई किस्से सुनाते हैं. दावा ये भी किया जाता है कि वहां
मौजूद पशु-पक्षी भी शाम होते ही, वन छोड़ देते हैं.निधिवन में मौजूद पेड़ भी अपनी तरह के बेहद खास हैं. जहां आमतौर पर पेड़ों
की शाखाएं ऊपर की और बढ़ती है, वहीं निधि वन में मौजूद पेड़ों की शाखाएं
नीचे की और बढ़ती हैं बढ़ती हैं. इन पेड़ों की स्थित ऐसी है कि रास्ता
बनाने के लिए उनकी शाखाओं को डंडों के सहारे फैलने सो रोका गया हैं.ऐसी मान्यता है कि जो रात में होने वाले भगवान श्री कृष्ण और राधा के रास
को देख लेता है वो पागल या अंधा हो जाता हैं. इसी कारण निधिवन के आसपास
मौजूद घरों में लोगों ने उस तरफ खिड़कियां नहीं लगाई हैं.
कई लोगों ने अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद करा दिया है. आसपास रहने वाले
लोगों के मुताबिक शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता.निधिवन में ही ठा. बिहारी जी महाराज का दर्शन स्थल हैं. मान्यता है कि
संगीत सम्राट और धुरपद के जनक स्वामी हरिदास भजन गाया करते थे. माना जाता
है कि बांके बिहारी जी ने उनकी भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर एक सपना दिया.
सपने में कहा कि मैं तुम्हारी साधना स्थल में ही विशाखा कुंड के पास जमीन में छिपा हूं. सपने के बाद हरिदास जी ने अपने शिष्यों की मदद से बिहारी जी
को निकलवाया और मंदिर की स्थापना की.
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35ए की
क़ानूनी मान्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के ख़िलाफ़ भारत
प्रशासित कश्मीर में बीते कई दिनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
अलगावादियों
ने गुरुवार और शुक्रवार को कश्मीर बंद बुलाया है. अलगावादियों के बंद के
आह्वान का समर्थन यहां के कई व्यापारिक संगठनों ने भी किया है.
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को अनुच्छेद 35ए पर सुनवाई होनी है.
अलगावादियों से लेकर मुख्यधारा के कई राजनीतिक दल अनुच्छेद 35ए के ख़िलाफ़ किसी भी छेड़छाड़ को लेकर एकजुट हो रहे हैं.
अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल है. इसके तहत
जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ जायदाद नहीं ख़रीद सकता है.
जम्मू कश्मीर कांग्रेस के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर कहते हैं कि कुछ ऐसी
ताक़तें हैं जो भारत और जम्मू -कश्मीर के रिश्ते कमज़ोर करना चाहती हैं.
गुलाम
अहमद मीर कहते हैं, "पहले बहुत कम लोग समझते थे. लेकिन बीते छह महीनों से
जब से अनुच्छेद 35 ए चर्चा में आया है, हिंदुस्तान के एक-एक बच्चे में
ख़ासकर कश्मीर के बच्चों में एक जागृति आई है. 1927 में महाराजा अनुच्छेद
35ए को वजूद में लाए. 35ए को 1954 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व
में हमारी सरकार ने भारतीय संविधान के ज़रिए धारा 370 का एक महत्वपूर्ण
हिस्सा जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए किया. अब जो लोग सुप्रीम कोर्ट तक जा
रहे हैं, हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है. इस देश में लोकतंत्र है और किसी को
भी अपनी बात रखने का अधिकार है. लेकिन हमें उम्मीद और विश्वास है कि
सुप्रीम कोर्ट बहुत गहराई से इस मुद्दे को देखेगा."
मीर का कहना है कि जिस समय इस मुद्दे को उठाया गया है उनकी पार्टी उसमें
सियासत देखती है. क्योंकि बीजेपी पूरे देश में एक नारा लेकर चली थी कि जब
वे सत्ता में आएंगे तो जम्मू कश्मीर में धारा 370 को खत्म करेंगे.
मीर कहते हैं, "2014 में भी बीजेपी ने इस मुद्दे को देश के सामने रखा
और वोट हासिल किए. जम्मू-कश्मीर में तीन साल तक जब तक सरकार में थे, तब इस
मुद्दे को वे उठा नहीं सकते थे. अब किसी संस्था या एनजीओ का सहारा लेकर इस
मुद्दे को किसी तरह 2019 के चुनाव तक चर्चा में रखना चाहते हैं."
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मुस्तफ़ा कमाल का कहना है कि उनकी पार्टी हर हाल में अनुच्छेद 35ए से छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ लड़ेगी.
वह
कहते हैं, "नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर में आम जनता को अनुच्छेत 35 ए
पर जागरूक किया है. लोग अब जान गए हैं और इसीलिए जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं. फिर चाहे वो जम्मू का क्षेत्र हो या लद्दाख का. दूसरे, क़ानूनी लड़ाई
लड़ने के लिए पार्टी के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने भारत के मशहूर
क़ानूनविदों को चुना है. केंद्र की भाजपा सरकार इस मुद्दे को आने वाले
चुनाव में इस्तेमाल करने की मंशा रखती है, लेकिन हमें सुप्रीम कोर्ट पर
विश्वास है और सच्चाई सामने आएगी."
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी का कहना है कि उनकी पार्टी
चाहती है कि न सिर्फ़ याचिका को टाला जाए बल्कि याचिका को सिरे से ही
ख़ारिज कर दिया जाए.
पीडीपी के प्रवक्ता रफ़ी अहमद मीर कहते हैं,
"जब हम सरकार में थे तो उस समय भी हमने अनुच्छेद 35ए के ख़िलाफ़ किसी तरह
की छेड़छाड़ न हो इसके लिए भरपूर कोशिश की. आज भी हम वह कोशिश कर रहे हैं.
हमने अनुच्छेद 35 ए के समर्थन में में प्रदर्शन भी किए. हमारी पार्टी के
सभी वकील इस समय दिल्ली में हैं और अनुच्छेद 35ए की छेड़छाड़ के ख़िलाफ़
कल सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. हम चाहते हैं कि ये जो हमारे सर पर
लटकती तलवार है वह हमेशा हमेशा के लिए हट जाए."
दूसरी तरफ़, अलगावादियों का कहना है कि अगर अनुच्छेद 35ए के साथ किसी
भी तरह की छेड़छाड़ की गई तो वह पूरे राज्य में जनआंदोलन छेड़ेंगे.
अलगाववादी
नेता सईद अली शाह गिलानी, मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ और यासीन मालिक ने
कई बार इस बात का दोहराया है कि अनुच्छेद 35ए के साथ छेड़छाड़ दरअसल आरएसएस
और बीजेपी का मंसूबा है जो जम्मू कश्मीर की डेमोग्राफी को बदलना चाहते
हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के स्टेट सेक्रेटरी मोहमद
यूसुफ तारिगामी कहते हैं कि अगर अनुच्छेद 35ए के साथ किसी भी तरह की
छेड़छाड़ की गई तो उसके नतीजे बुहत ख़तरनाक हो सकते हैं.
निर्दलीय
विधायक और आवामी इतिहाद पार्टी के प्रमुख इंजीनियर रशीद ने कहा कि वह
केंद्र सरकार से अपील करते हैं कि इस याचिका को ख़ारिज करें और उसके बाद
कश्मीर मुद्दे पर बात करें.
वहीं, जम्मू कश्मीर बीजेपी का कहना है
कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फ़ैसला होगा वह उन्हें क़बूल होगा. पार्टी के
स्टेट जनरल सेक्रेटरी अशोक कौल कहते हैं, "हमने पहले भी कहा है और आज भी कह
रहे हैं कि जो भी फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का होगा, हमें वह क़बूल होगा."
साल 2014 में दिल्ली के एक गैर सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल कर अनुच्छेद 35ए को क़ानूनी चुनौती दी थी.
इस समय जम्मू-कश्मीर में राजपाल शासन है. कुछ ही दिन पहले ही जम्मू कश्मीर में नए राज्यपाल सत्यपाल मालिक की नियुक्ति हुई है.
चाचा अक्सर हमारे घर आते थे. बहुत हंसमुख और मिलनसार किस्म के थे वो.
कभी बच्चों के लिए संतरे लाते तो कभी बेकरी वाले बिस्किट. सभी लोग उन्हें
बहुत पसंद करते थे, लेकिन मुझे वो रत्ती भर भी पसंद नहीं थे.'
'वो
मुझे देखते ही गोद में उठा लेते और चूमने की कोशिश करते. अपनी खुरदरी-सी
दाढ़ी मेरे चेहरे पर रगड़ने लगते और मुझे तब तक गोदी से नहीं उतारते जब तक
मैं उन्हें जोर का चांटा न मार दूं, या नाखून न लगा दूं.'
23 साल की रचिता ये बातें बताते हुए घृणा और ग़ुस्से से भर उठती हैं. उनके साथ ये हादसा तब हुआ जब वो सात-आठ साल की थीं.
यौन शोषण के मामलों में एक बड़ा हिस्सा वो होता है जिसमें अपराधी
पीड़िता का क़रीबी होता है. ऐसे हालात में न तो जुर्म की शिकायत आसानी से
हो पाती है और न इनकी सुनवाई या फ़ैसला.
लेकिन क्या वाक़ई ज़ुर्म की
शिकायत या सुनवाई इतनी मुश्किल है? उस औरत पर क्या बीतती होगी जिसका अपना
ही उसका उत्पीड़न करता है? ऐसी स्थिति में कहां जाएं? किससे मदद मांगें?
इन्हीं सवालों को ध्यान में रखते हुए बीबीसी हिंदी एक ख़ास सिरीज़ शुरू
करने जा रहा है. इस दौरान महिलाएं और लड़कियां अपने अनुभव साझा करेंगी.
इसके साथ ही हम महिलाओं के क़ानूनी अधिकारों और उन्हें मिल सकने वाली मदद
के बारे में बात करते हुए इससे जुड़े तमाम मसलों पर रोशनी डालेंगे.
आने वाले दिनों में इससे भी भयावह अनुभव वाली रिपोर्ट आप हमारी वेबसाइट चिता बताती हैं, "आख़िर एक दिन मैंने हिचकिचाते हुए मम्मी से कह ही
दिया. मैंने कहा कि गौरव चाचा अपनी दाढ़ी मेरे चेहरे पर रगड़ते हैं तो मुझे
बहुत बुरा लगता है. मम्मी ने पूछा, कुछ और तो नहीं किया? मैंने ना में सिर
हिलाया."वो कहती हैं, "उस दिन के बाद से उन्होंने गौरव चाचा को मुझ
तक पहुंचने ही नहीं दिया. उनके आते ही मुझे दूसरे कमरे में बिठा देतीं और
पूछने पर कहतीं कि पढ़ाई कर रही है या खेलने गई है."
वह अब इस बात को
लगभग भूल गई हैं, लेकिन जब भी यौन उत्पीड़न या इससे मिलते-जुलते शब्द
सुनती हैं तो ज़ेहन में ये बातें उभरकर ज़रूर आ जाती हैं.
यह कहानी
अकेले रचिता की नहीं है. आंकड़ों पर गौर करें तो यौन उत्पीड़न के अधिकतर
मामले ऐसे होते हैं जिसमें अपराधी या तो पीड़ित के परिवार का सदस्य होता है
या कोई रिश्तेदार या फिर कोई जानने वाला.
हालांकि रचिता ख़ुशक़िस्मत थीं कि उनके घरवालों ने उनकी बात समझी, लेकिन ऐसी मदद और सहानुभूति बहुत कम लोगों को ही मिल पाती है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड् ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2015 में
महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 3,27,394 मामले दर्ज किए गए. इनमें रेप के
34, 651 मामले थे और 33,098 मामलों में अपराधी पीड़िता का जानने वाला था.
महिलाओं
के लिए काम करने वाले एनजीओ 'ब्रेकथ्रू' की सीनियर मैनेजर पॉलिन गोमेज
कहती हैं,''हमने ऐसे मामले देखे हैं जहां दामाद ने सास का यौन उत्पीड़न
किया, भाई ने बहन का, पिता ने बेटी का या फिर दादा ने पोती का.''
अगर ऐसा हो तो क्या करना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में पॉलिन कहती हैं, "अपनी बात तब तक कहते रहिए जब तक कोई सुन न ले, कोई प्रतिक्रिया न दे दे."
वो
कहती हैं, "कई लोगों से कहिए. स्कूल-कॉलेज में कहिए. पुलिस या मजिस्ट्रेट
के पास जाइए. किसी एनजीओ की मदद लीजिए, हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल कीजिए. कुछ
भी कीजिए, लेकिन चुप मत बैठिए."
सेंटर फ़ॉर रिहैबिलिटेशन ऐंड
डेवलपमेंट में क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ. श्रावस्ती वेंकटेश कहती हैं, "यौन
शोषण के पीड़ितों में ग़ुस्सा, ग्लानि और निराशा का भाव होता है. मदद न
मिलने पर यह और बढ़ जाता है."
वो कहती हैं, "कई बार पीड़ित घटना के सालों बाद भी उससे पूरी तरह उबर नहीं पाता. ऐसे में काउंसलिंग बहुत मददगार साबित होती है."
पॉलिन
गोमेज़ कहती हैं, ''कई बार लोग जुर्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहते हैं,
लेकिन क़ानून और बाक़ी चीजों की सही जानकारी न होने की वजह से ख़ामोश रहकर
तकलीफ़ें झेलते रहते हैं. यह स्थिति बहुत ही भयावह है.
अक्टूबर 2005 में उत्तरी पाकिस्तान और
कश्मीर के दोनों भागों में ज़बर्दस्त भूकंप आया. सैकड़ों लोग, हज़ारों घर
और कई किलोमीटर सड़कें तबाह हो गईं.
मौत के सन्नाटे ने लाशों की बू
का कम्बल ओढ़ लिया. किसी के लिए किसी की आंखों में आंसू नहीं थे. जो ज़िंदा
थे वो सकते में थे, जो घायल थे उन्हें घाव गिनने से ही फ़ुर्सत न थी.
जो
स्वयंसेवी, एनजीओ पाकिस्तान और दुनिया के कोने-कोने से मदद करने पहुंचे,
उन्हें न दिन नज़र आता था, न रात दिखाई देती थी और न ही तारीख़ याद थी.
उन्हें तो ये भी याद नहीं रहता था कि सुबह नाश्ता किया था या नहीं.
मगर
भूकंप के तीन-चार दिन बाद कुछ और लोग भी इन बर्बाद इलाक़ों में गाड़ियों
में बैठकर आने लगे. सफ़ेद कपड़े, पगड़ियां भी अलग-अलग रंगों की.
किसी
की स्याह दाढ़ी तो किसी की सफ़ेद तो किसी की ख़शख़शी. वो किसी की मदद नहीं
कर रहे थे बल्कि अपनी अपनी गाड़ियों पर बैठे तक़रीर कर रहे थे. ये भूकंप नहीं, अल्लाह का अज़ाब है. ये हमारे ग़ुनाहों की सज़ा है.
हमारी औरतें बेपर्दा हैं. हमारे मर्द क्लीन शेव हैं. हम जुए, शराब और
नाजायज़ संभोग में ग़र्क हैं. हमारे हाक़िम बेईमान, घूसख़ोर और अय्याश हैं.
हम यहूदियों के दोस्त हैं और इस्लाम का मज़ाक उड़ाते हैं. हम खुलेआम नाचते
हैं, मांओं-बहनों को छेड़ते हैं, हम ख़ुदा का हुक़्म हंसी ठट्ठे में उड़ा
देते हैं, इसलिए हम पर मुसीबतें तो आनी ही हैं. ये भूकंप तो शुरुआत है, डरो
उस वक़्त से जब तुम्हारे गुनाहों की सज़ा के बदले सामने के दोनों पहाड़ों
को टकराकर तुम्हें सुरमा कर दिया जाएगा. जब दरिया किनारे तोड़कर तुम्हें
बहाकर ले जाएंगे. अब भी वक़्त है, तौबा कर लो. हो सकता है आने वाले अज़ाब
टल जाएं.'
फिर ये गाड़ियां आगे बढ़ जातीं. किसी और तबाह होने वाले
इलाक़े में खड़ी हो जातीं, जहां लोग अपने अपने प्यारों की लाशें मलबे में
ढूंढ रहे होते और उनके कानों में अपने ही गुनाहों की गिनती उड़ेली जा रही
होती.
जब यूरोप में प्लेग फैला तो पादरी लाशों को दफ़नाने की बजाय यही कह रहा था कि इसका कारण गंदगी नहीं बल्कि ये हमारे गुनाहों की सज़ा है.
मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं. जहां एक तरफ़ चंद्रयान, सैटेलाइट, आसमानों
की ख़बर ला रहा है, मगर इन्हीं आसमानों में रहने वाले देवी-देवता केरल के लोगों को बीफ़ खाने
केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार को
अपने ही सांसद के बयान से असहज होना पड़ा है. बीजेपी के राज्यसभा सांसद
सुब्रमण्यम स्वामी ने शुक्रवार को ट्वीट किया था कि अगर मालदीव के
राष्ट्रपति चुनाव में धांधली होती है तो भारत को आक्रमण कर देना चाहिए.
स्वामी ने ये बात कोलंबो में मालदीव के निर्वासित पूर्व राष्ट्रपति
मोहम्मद नशीद से मुलाक़ात के बाद कही थी. अब भारत के विदेश मंत्रालय के
प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्वामी के बयान को उनकी निजी सोच बताया है और कहा
है कि उनसे सरकार सहमत नहीं है.
स्वामी ने पिछले हफ़्ते मंगलवार को
कोलंबो में मोहम्मद नशीद से मुलाक़ात की थी. नशीद ने स्वामी से मालदीव में
23 सितंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला
यामीन की तरफ़ से गड़बड़ी कराए जाने की आशंका ज़ाहिर की थी.
और मंदिर में महिलाओं को दाख़िले की इजाज़त देने की सज़ा दे रहे हैं.
मेरा
नज़रिया, आपके नज़रिये से अलग सही. मैं और आप भले एक दूसरे के ख़ून के
प्यासे सही. पर मौलवी, पंडित, पादरी, रब्बाई - भाई भाई. इन सबको एक ही
नज़रिये की डोर ने एक-दूसरे से बांध रखा है.
हंसना हराम है. रोना हलाल है. लोगों को डराओ और बस डराओ. न डरें तो अपने-अपने ख़ुदा को बीच में ले आओ.
साल 1942 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ देश में चल रहा 'भारत छोड़ो' आंदोलन अपने चरम पर था.
उस
वक़्त तक महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में क्रांतिकारी नेता क्रांति सिंह
नाना पाटिल 'समानांतर सरकार' का बीज बो चुके थे. महाराष्ट्र में लोग इस
आंदोलन को 'पत्री सरकार' के रूप में जानते थे.
क्रांति सिंह नाना
पाटिल ने इससे पहले महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव में आकर अपनी
सरकारी नौकरी छोड़ दी थी और राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गये थे.
गांधी
के नेतृत्व में 'असहयोग आंदोलन' में भाग लेने के बाद, साल 1942 में क्रांति सिंह ने महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में समानांतर सरकार की स्थापना
की.
उन्होंने सभी गाँवों में जाकर लोगों को स्वदेशी उत्पादों के
महत्व के बारे में समझाया. उन्होंने लोगों को ब्रिटिश शासन के अधिकार को
उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने अपनी समानांतर सरकार के तहत हर गाँव में कमेटियों का गठन किया
था. ये समितियां निःस्वार्थ रूप से काम करती थीं और समानांतर सरकार के
सिद्धान्तों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से अपने काम करती थीं.
इस दौरान लोगों ने गाँवों में मिलने वाले सभी विदेशी कपड़ों को फूंक दिया था.
क्रांति
सिंह नाना पाटिल के इस आंदोलन से ब्रिटिश परेशान थे. ब्रिटिश शासन ने
पाटिल को रोकने के लिए ये घोषणा की थी कि जो भी पाटिल को पकड़वाने में उनकी मदद करेगा, उसे वो बड़ा पुरस्कार देंगे.रिटिश शासन ने उनके बारे में जानकारी जुटाने की तमाम कोशिशे कीं, लेकिन
वो उन्हें कभी पकड़ नहीं पाए. जबकि पाटिल भूमिगत होकर लगातार अपना काम कर
रहे थे. वो लगातार लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भड़का रहे थे.
माना
जाता है कि लोगों पर पाटिल के सशक्त व्यक्तित्व और उनकी कड़क आवाज़ का
काफ़ी प्रभाव था. महाराष्ट्र के बहुत से नौजवान पाटिल के 'समानांतर सरकार'
आंदोलन के लिए काम करने लगे थे.
स्वतंत्रता सेनानी जी डी बापू लाड,
शाहिर शंकर राव निकम और बहादुर क्रांतिकारी महिला हौसा बाई पाटिल ने अपने
पिता द्वारा शुरू किेए गए पत्री सरकार आंदोलन का दृढ़ता से समर्थन किया था.
क्रांति सिंह नाना पाटिल की बेटी हौसाबाई पाटिल अब 93 साल की हैं और महाराष्ट्र के सांगली ज़िले के हनमंतवडिये गाँव में रहती हैं.
बीबीसी से बातचीत में हौसाबाई पाटिल ने अपने पिता से जुड़े कुछ किस्सों का ज़िक्र किया.
हौसाबाई भले ही बूढ़ी हो गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़ में आज भी वो जोश बरकरार है.
उन्होंने
बताया, "उन दिनों हम इस आंदोलन से जुड़े लोगों को आवश्यक हथियार मुहैया
करवाते थे. मुझे सांगली ज़िले के भवानी नगर स्थित पुलिस स्टेशन में रखीं
बंदूकों को निकालने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. भरी दोपहर में हथियार लूटना,
किसी बाघ के मुँह में अपना हाथ डालने से कम नहीं था. लेकिन हमें वो काम
करना ही था."
हौसाबाई के अनुसार, उस वक़्त उनकी सबसे बड़ी
ज़िम्मेदारी अपने सभी सहयोगियों को उनकी जिम्मेदारियाँ समझाना था. जिस दिन
लूट की ये कार्रवाई हुई, उस दिन हौसाबाई के नेतृत्व में ही कुछ लोग पुलिस
थाने में दाख़िल हुए थे.
उन्होंने बताया, "हमारा एक सहयोगी मेरा भाई
बनने का नाटक कर रहा था. उसने थाना परिसर में मुझे ये कहते हुए पीटना शुरू
किया कि मैं अपने पति के घर वापस क्यों नहीं लौट जाती हूँ. उसने मुझे मारने
के लिए हाथों में एक बड़ा पत्थर उठा लिया था. ये देखकर थाने में तैनात
पुलिसवाले बीच-बचाव करने आ गये. वहाँ भीड़ जमा हो गई. और मौक़ा देखकर हमारे
बाकी साथियों ने थाने से बंदूकें और कारतूस चोरी कर लिए."
हौसाबाई कहती हैं कि सभी आंदोलनकारियों का हौसला देखकर नाना पाटिल रोने लगे थे.
वो
बताती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पत्री सरकार आंदोलन के
कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश सरकार को परेशान करने और उन्हें खदेड़ने के लिए कई नये तरीक़े निकाल लिये थे.
कभी वो पोस्ट हाउस जला देते थे. कभी
रेलवे की पटरियों को तोड़ देते थे. कई बार टेलीफ़ोन की लाइनों को भी उखाड़ा
गया था. इनमें से कई गतिविधियों को हौसाबाई के नेतृत्व में अंजाम दिया गया
था.
हौसाबाई ने बताया, "क्रांति सिंह पाटिल अंत तक जंगलों में ही घूमते रहे.
उन्होंने अपने जीवन के एक बड़े हिस्से में भूमिगत रहकर ही काम किया और
उनकी 'समानांतर सरकार' ने स्वतंत्रता जीती. लेकिन आज भी एक सवाल जो हमेशा
मेरे दिमाग़ में रहता है, वो ये कि क्या वाक़ई हम आज़ाद हैं? ये बड़े दुख
की बात है कि देश में लोगों की भोजन और कपड़े जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी
पूरी नहीं हो पा रहीं."
वर्तमान सरकार के बारे में बात करते हुए
हौसाबाई ने कहा, "अगर मेरे पिता क्रांति सिंह नाना पाटिल आज जीवित होते, तो
वो इस सरकार को तीन दिन से ज़्यादा चलने नहीं देते. वो इस सरकार की
धज्जियाँ उड़ा देते."
हौसाबाई, क्रांति सिंह की अकेली संतान हैं. उन्होंने तीन साल की उम्र में ही अपनी माँ को खो दिया था.
उन्होंने
अपने पिता के साथ भी बहुत कम वक़्त बिताया क्योंकि उनके पिता क्रांति सिंह
देश की सेवा में उलझे हुए थे. लेकिन हौसाबाई मानती हैं कि इन्हीं
परिस्थितियों ने उनके मन में भी देशभक्ति का बीज बोया.
पत्रि सरकार आंदोलन पर लिखनेवालों ने इस आंदोलन में हौसाबाई की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में काफ़ी लिखा है.
आंदोलन
के दौरान गुप्त संदेश लाने, ले जाने के अलावा खाने-पीने की व्यवस्था करना,
परिवहन का बंदोबस्त और प्रदर्शनों के आयोजन की अहम ज़िम्मेदारी भी हौसाबाई
के पास ही थी.
इस बारे में हौसाबाई ने बताया, "गुप्त संदेश ले जाना
सबसे मुश्किल काम हुआ करता था. पुलिस अधिकारी निरीक्षण में हमें पकड़ न
सकें, इसके लिए हम अपने बालों में या चुटिया के भीतर कागज़ की चिट छिपाकर
ले जाते थे. एक बार मुझे और मेरे साथी कार्यकर्ता को ब्रितानी अफ़सरों ने
रोक लिया था. उन्होंने हमसे कई तरह के सवाल पूछने शुरू किये. हमारे पास एक
अहम गुप्त संदेश था. हम उसे लीक नहीं होने दे सकते थे. इसलिए मैंने उस चिट
को मौक़ा देखकर चबा लिया. उस वक़्त, इसके अलावा बचने का कोई और तरीक़ा ही
नहीं था."