Friday, August 31, 2018

35 ए पर क्या कहती हैं जम्मू-कश्मीर की पार्टियां?

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35ए की क़ानूनी मान्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के ख़िलाफ़ भारत प्रशासित कश्मीर में बीते कई दिनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
अलगावादियों ने गुरुवार और शुक्रवार को कश्मीर बंद बुलाया है. अलगावादियों के बंद के आह्वान का समर्थन यहां के कई व्यापारिक संगठनों ने भी किया है.
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को अनुच्छेद 35ए पर सुनवाई होनी है.
अलगावादियों से लेकर मुख्यधारा के कई राजनीतिक दल अनुच्छेद 35ए के ख़िलाफ़ किसी भी छेड़छाड़ को लेकर एकजुट हो रहे हैं.
अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल है. इसके तहत जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ जायदाद नहीं ख़रीद सकता है.
जम्मू कश्मीर कांग्रेस के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर कहते हैं कि कुछ ऐसी ताक़तें हैं जो भारत और जम्मू -कश्मीर के रिश्ते कमज़ोर करना चाहती हैं.
गुलाम अहमद मीर कहते हैं, "पहले बहुत कम लोग समझते थे. लेकिन बीते छह महीनों से जब से अनुच्छेद 35 ए चर्चा में आया है, हिंदुस्तान के एक-एक बच्चे में ख़ासकर कश्मीर के बच्चों में एक जागृति आई है. 1927 में महाराजा अनुच्छेद 35ए को वजूद में लाए. 35ए को 1954 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में हमारी सरकार ने भारतीय संविधान के ज़रिए धारा 370 का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए किया. अब जो लोग सुप्रीम कोर्ट तक जा रहे हैं, हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है. इस देश में लोकतंत्र है और किसी को भी अपनी बात रखने का अधिकार है. लेकिन हमें उम्मीद और विश्वास है कि सुप्रीम कोर्ट बहुत गहराई से इस मुद्दे को देखेगा."
मीर का कहना है कि जिस समय इस मुद्दे को उठाया गया है उनकी पार्टी उसमें सियासत देखती है. क्योंकि बीजेपी पूरे देश में एक नारा लेकर चली थी कि जब वे सत्ता में आएंगे तो जम्मू कश्मीर में धारा 370 को खत्म करेंगे.
मीर कहते हैं, "2014 में भी बीजेपी ने इस मुद्दे को देश के सामने रखा और वोट हासिल किए. जम्मू-कश्मीर में तीन साल तक जब तक सरकार में थे, तब इस मुद्दे को वे उठा नहीं सकते थे. अब किसी संस्था या एनजीओ का सहारा लेकर इस मुद्दे को किसी तरह 2019 के चुनाव तक चर्चा में रखना चाहते हैं."
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मुस्तफ़ा कमाल का कहना है कि उनकी पार्टी हर हाल में अनुच्छेद 35ए से छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ लड़ेगी.
वह कहते हैं, "नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर में आम जनता को अनुच्छेत 35 ए पर जागरूक किया है. लोग अब जान गए हैं और इसीलिए जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं. फिर चाहे वो जम्मू का क्षेत्र हो या लद्दाख का. दूसरे, क़ानूनी लड़ाई लड़ने के लिए पार्टी के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने भारत के मशहूर क़ानूनविदों को चुना है. केंद्र की भाजपा सरकार इस मुद्दे को आने वाले चुनाव में इस्तेमाल करने की मंशा रखती है, लेकिन हमें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास है और सच्चाई सामने आएगी."
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी का कहना है कि उनकी पार्टी चाहती है कि न सिर्फ़ याचिका को टाला जाए बल्कि याचिका को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया जाए.
पीडीपी के प्रवक्ता रफ़ी अहमद मीर कहते हैं, "जब हम सरकार में थे तो उस समय भी हमने अनुच्छेद 35ए के ख़िलाफ़ किसी तरह की छेड़छाड़ न हो इसके लिए भरपूर कोशिश की. आज भी हम वह कोशिश कर रहे हैं. हमने अनुच्छेद 35 ए के समर्थन में में प्रदर्शन भी किए. हमारी पार्टी के सभी वकील इस समय दिल्ली में हैं और अनुच्छेद 35ए की छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ कल सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. हम चाहते हैं कि ये जो हमारे सर पर लटकती तलवार है वह हमेशा हमेशा के लिए हट जाए."
दूसरी तरफ़, अलगावादियों का कहना है कि अगर अनुच्छेद 35ए के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गई तो वह पूरे राज्य में जनआंदोलन छेड़ेंगे.
अलगाववादी नेता सईद अली शाह गिलानी, मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ और यासीन मालिक ने कई बार इस बात का दोहराया है कि अनुच्छेद 35ए के साथ छेड़छाड़ दरअसल आरएसएस और बीजेपी का मंसूबा है जो जम्मू कश्मीर की डेमोग्राफी को बदलना चाहते हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के स्टेट सेक्रेटरी मोहमद यूसुफ तारिगामी कहते हैं कि अगर अनुच्छेद 35ए के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गई तो उसके नतीजे बुहत ख़तरनाक हो सकते हैं.
निर्दलीय विधायक और आवामी इतिहाद पार्टी के प्रमुख इंजीनियर रशीद ने कहा कि वह केंद्र सरकार से अपील करते हैं कि इस याचिका को ख़ारिज करें और उसके बाद कश्मीर मुद्दे पर बात करें.
वहीं, जम्मू कश्मीर बीजेपी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फ़ैसला होगा वह उन्हें क़बूल होगा. पार्टी के स्टेट जनरल सेक्रेटरी अशोक कौल कहते हैं, "हमने पहले भी कहा है और आज भी कह रहे हैं कि जो भी फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का होगा, हमें वह क़बूल होगा."
साल 2014 में दिल्ली के एक गैर सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल कर अनुच्छेद 35ए को क़ानूनी चुनौती दी थी.
इस समय जम्मू-कश्मीर में राजपाल शासन है. कुछ ही दिन पहले ही जम्मू कश्मीर में नए राज्यपाल सत्यपाल मालिक की नियुक्ति हुई है.

Wednesday, August 29, 2018

चाचा को सब पसंद करते थे लेकिन मैं नहीं

चाचा अक्सर हमारे घर आते थे. बहुत हंसमुख और मिलनसार किस्म के थे वो. कभी बच्चों के लिए संतरे लाते तो कभी बेकरी वाले बिस्किट. सभी लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे, लेकिन मुझे वो रत्ती भर भी पसंद नहीं थे.'
'वो मुझे देखते ही गोद में उठा लेते और चूमने की कोशिश करते. अपनी खुरदरी-सी दाढ़ी मेरे चेहरे पर रगड़ने लगते और मुझे तब तक गोदी से नहीं उतारते जब तक मैं उन्हें जोर का चांटा न मार दूं, या नाखून न लगा दूं.'
23 साल की रचिता ये बातें बताते हुए घृणा और ग़ुस्से से भर उठती हैं. उनके साथ ये हादसा तब हुआ जब वो सात-आठ साल की थीं.
यौन शोषण के मामलों में एक बड़ा हिस्सा वो होता है जिसमें अपराधी पीड़िता का क़रीबी होता है. ऐसे हालात में न तो जुर्म की शिकायत आसानी से हो पाती है और न इनकी सुनवाई या फ़ैसला.
लेकिन क्या वाक़ई ज़ुर्म की शिकायत या सुनवाई इतनी मुश्किल है? उस औरत पर क्या बीतती होगी जिसका अपना ही उसका उत्पीड़न करता है? ऐसी स्थिति में कहां जाएं? किससे मदद मांगें?
इन्हीं सवालों को ध्यान में रखते हुए बीबीसी हिंदी एक ख़ास सिरीज़ शुरू करने जा रहा है. इस दौरान महिलाएं और लड़कियां अपने अनुभव साझा करेंगी. इसके साथ ही हम महिलाओं के क़ानूनी अधिकारों और उन्हें मिल सकने वाली मदद के बारे में बात करते हुए इससे जुड़े तमाम मसलों पर रोशनी डालेंगे.
आने वाले दिनों में इससे भी भयावह अनुभव वाली रिपोर्ट आप हमारी वेबसाइट चिता बताती हैं, "आख़िर एक दिन मैंने हिचकिचाते हुए मम्मी से कह ही दिया. मैंने कहा कि गौरव चाचा अपनी दाढ़ी मेरे चेहरे पर रगड़ते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है. मम्मी ने पूछा, कुछ और तो नहीं किया? मैंने ना में सिर हिलाया."वो कहती हैं, "उस दिन के बाद से उन्होंने गौरव चाचा को मुझ तक पहुंचने ही नहीं दिया. उनके आते ही मुझे दूसरे कमरे में बिठा देतीं और पूछने पर कहतीं कि पढ़ाई कर रही है या खेलने गई है."
वह अब इस बात को लगभग भूल गई हैं, लेकिन जब भी यौन उत्पीड़न या इससे मिलते-जुलते शब्द सुनती हैं तो ज़ेहन में ये बातें उभरकर ज़रूर आ जाती हैं.
यह कहानी अकेले रचिता की नहीं है. आंकड़ों पर गौर करें तो यौन उत्पीड़न के अधिकतर मामले ऐसे होते हैं जिसमें अपराधी या तो पीड़ित के परिवार का सदस्य होता है या कोई रिश्तेदार या फिर कोई जानने वाला.
हालांकि रचिता ख़ुशक़िस्मत थीं कि उनके घरवालों ने उनकी बात समझी, लेकिन ऐसी मदद और सहानुभूति बहुत कम लोगों को ही मिल पाती है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड् ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2015 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 3,27,394 मामले दर्ज किए गए. इनमें रेप के 34, 651 मामले थे और 33,098 मामलों में अपराधी पीड़िता का जानने वाला था.
महिलाओं के लिए काम करने वाले एनजीओ 'ब्रेकथ्रू' की सीनियर मैनेजर पॉलिन गोमेज कहती हैं,''हमने ऐसे मामले देखे हैं जहां दामाद ने सास का यौन उत्पीड़न किया, भाई ने बहन का, पिता ने बेटी का या फिर दादा ने पोती का.''
अगर ऐसा हो तो क्या करना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में पॉलिन कहती हैं, "अपनी बात तब तक कहते रहिए जब तक कोई सुन न ले, कोई प्रतिक्रिया न दे दे."
वो कहती हैं, "कई लोगों से कहिए. स्कूल-कॉलेज में कहिए. पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास जाइए. किसी एनजीओ की मदद लीजिए, हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल कीजिए. कुछ भी कीजिए, लेकिन चुप मत बैठिए."
सेंटर फ़ॉर रिहैबिलिटेशन ऐंड डेवलपमेंट में क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ. श्रावस्ती वेंकटेश कहती हैं, "यौन शोषण के पीड़ितों में ग़ुस्सा, ग्लानि और निराशा का भाव होता है. मदद न मिलने पर यह और बढ़ जाता है."
वो कहती हैं, "कई बार पीड़ित घटना के सालों बाद भी उससे पूरी तरह उबर नहीं पाता. ऐसे में काउंसलिंग बहुत मददगार साबित होती है."
पॉलिन गोमेज़ कहती हैं, ''कई बार लोग जुर्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहते हैं, लेकिन क़ानून और बाक़ी चीजों की सही जानकारी न होने की वजह से ख़ामोश रहकर तकलीफ़ें झेलते रहते हैं. यह स्थिति बहुत ही भयावह है.

Sunday, August 26, 2018

वुसअत का ब्लॉग: आपदा आई और पंडित मौलवी बन गए भाई-भाई

अक्टूबर 2005 में उत्तरी पाकिस्तान और कश्मीर के दोनों भागों में ज़बर्दस्त भूकंप आया. सैकड़ों लोग, हज़ारों घर और कई किलोमीटर सड़कें तबाह हो गईं.
मौत के सन्नाटे ने लाशों की बू का कम्बल ओढ़ लिया. किसी के लिए किसी की आंखों में आंसू नहीं थे. जो ज़िंदा थे वो सकते में थे, जो घायल थे उन्हें घाव गिनने से ही फ़ुर्सत न थी.
जो स्वयंसेवी, एनजीओ पाकिस्तान और दुनिया के कोने-कोने से मदद करने पहुंचे, उन्हें न दिन नज़र आता था, न रात दिखाई देती थी और न ही तारीख़ याद थी. उन्हें तो ये भी याद नहीं रहता था कि सुबह नाश्ता किया था या नहीं.
मगर भूकंप के तीन-चार दिन बाद कुछ और लोग भी इन बर्बाद इलाक़ों में गाड़ियों में बैठकर आने लगे. सफ़ेद कपड़े, पगड़ियां भी अलग-अलग रंगों की.
किसी की स्याह दाढ़ी तो किसी की सफ़ेद तो किसी की ख़शख़शी. वो किसी की मदद नहीं कर रहे थे बल्कि अपनी अपनी गाड़ियों पर बैठे तक़रीर कर रहे थे. ये भूकंप नहीं, अल्लाह का अज़ाब है. ये हमारे ग़ुनाहों की सज़ा है. हमारी औरतें बेपर्दा हैं. हमारे मर्द क्लीन शेव हैं. हम जुए, शराब और नाजायज़ संभोग में ग़र्क हैं. हमारे हाक़िम बेईमान, घूसख़ोर और अय्याश हैं. हम यहूदियों के दोस्त हैं और इस्लाम का मज़ाक उड़ाते हैं. हम खुलेआम नाचते हैं, मांओं-बहनों को छेड़ते हैं, हम ख़ुदा का हुक़्म हंसी ठट्ठे में उड़ा देते हैं, इसलिए हम पर मुसीबतें तो आनी ही हैं. ये भूकंप तो शुरुआत है, डरो उस वक़्त से जब तुम्हारे गुनाहों की सज़ा के बदले सामने के दोनों पहाड़ों को टकराकर तुम्हें सुरमा कर दिया जाएगा. जब दरिया किनारे तोड़कर तुम्हें बहाकर ले जाएंगे. अब भी वक़्त है, तौबा कर लो. हो सकता है आने वाले अज़ाब टल जाएं.'
फिर ये गाड़ियां आगे बढ़ जातीं. किसी और तबाह होने वाले इलाक़े में खड़ी हो जातीं, जहां लोग अपने अपने प्यारों की लाशें मलबे में ढूंढ रहे होते और उनके कानों में अपने ही गुनाहों की गिनती उड़ेली जा रही होती.
जब यूरोप में प्लेग फैला तो पादरी लाशों को दफ़नाने की बजाय यही कह रहा था कि इसका कारण गंदगी नहीं बल्कि ये हमारे गुनाहों की सज़ा है.
मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं. जहां एक तरफ़ चंद्रयान, सैटेलाइट, आसमानों की ख़बर ला रहा है, मगर इन्हीं आसमानों में रहने वाले देवी-देवता केरल के लोगों को बीफ़ खाने
केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार को अपने ही सांसद के बयान से असहज होना पड़ा है. बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने शुक्रवार को ट्वीट किया था कि अगर मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली होती है तो भारत को आक्रमण कर देना चाहिए.
स्वामी ने ये बात कोलंबो में मालदीव के निर्वासित पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद से मुलाक़ात के बाद कही थी. अब भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्वामी के बयान को उनकी निजी सोच बताया है और कहा है कि उनसे सरकार सहमत नहीं है.
स्वामी ने पिछले हफ़्ते मंगलवार को कोलंबो में मोहम्मद नशीद से मुलाक़ात की थी. नशीद ने स्वामी से मालदीव में 23 सितंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की तरफ़ से गड़बड़ी कराए जाने की आशंका ज़ाहिर की थी.
और मंदिर में महिलाओं को दाख़िले की इजाज़त देने की सज़ा दे रहे हैं.
मेरा नज़रिया, आपके नज़रिये से अलग सही. मैं और आप भले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे सही. पर मौलवी, पंडित, पादरी, रब्बाई - भाई भाई. इन सबको एक ही नज़रिये की डोर ने एक-दूसरे से बांध रखा है.
हंसना हराम है. रोना हलाल है. लोगों को डराओ और बस डराओ. न डरें तो अपने-अपने ख़ुदा को बीच में ले आओ.

Friday, August 17, 2018

ब्रितानी हुकूमत के दौरान अपनी ‘सरकार’ चलाने वाले क्रांतिकारी

साल 1942 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ देश में चल रहा 'भारत छोड़ो' आंदोलन अपने चरम पर था.
उस वक़्त तक महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में क्रांतिकारी नेता क्रांति सिंह नाना पाटिल 'समानांतर सरकार' का बीज बो चुके थे. महाराष्ट्र में लोग इस आंदोलन को 'पत्री सरकार' के रूप में जानते थे.
क्रांति सिंह नाना पाटिल ने इससे पहले महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव में आकर अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी और राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गये थे.
गांधी के नेतृत्व में 'असहयोग आंदोलन' में भाग लेने के बाद, साल 1942 में क्रांति सिंह ने महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में समानांतर सरकार की स्थापना की.
उन्होंने सभी गाँवों में जाकर लोगों को स्वदेशी उत्पादों के महत्व के बारे में समझाया. उन्होंने लोगों को ब्रिटिश शासन के अधिकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने अपनी समानांतर सरकार के तहत हर गाँव में कमेटियों का गठन किया था. ये समितियां निःस्वार्थ रूप से काम करती थीं और समानांतर सरकार के सिद्धान्तों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से अपने काम करती थीं.
इस दौरान लोगों ने गाँवों में मिलने वाले सभी विदेशी कपड़ों को फूंक दिया था.
क्रांति सिंह नाना पाटिल के इस आंदोलन से ब्रिटिश परेशान थे. ब्रिटिश शासन ने पाटिल को रोकने के लिए ये घोषणा की थी कि जो भी पाटिल को पकड़वाने में उनकी मदद करेगा, उसे वो बड़ा पुरस्कार देंगे.रिटिश शासन ने उनके बारे में जानकारी जुटाने की तमाम कोशिशे कीं, लेकिन वो उन्हें कभी पकड़ नहीं पाए. जबकि पाटिल भूमिगत होकर लगातार अपना काम कर रहे थे. वो लगातार लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भड़का रहे थे.
माना जाता है कि लोगों पर पाटिल के सशक्त व्यक्तित्व और उनकी कड़क आवाज़ का काफ़ी प्रभाव था. महाराष्ट्र के बहुत से नौजवान पाटिल के 'समानांतर सरकार' आंदोलन के लिए काम करने लगे थे.
स्वतंत्रता सेनानी जी डी बापू लाड, शाहिर शंकर राव निकम और बहादुर क्रांतिकारी महिला हौसा बाई पाटिल ने अपने पिता द्वारा शुरू किेए गए पत्री सरकार आंदोलन का दृढ़ता से समर्थन किया था.
क्रांति सिंह नाना पाटिल की बेटी हौसाबाई पाटिल अब 93 साल की हैं और महाराष्ट्र के सांगली ज़िले के हनमंतवडिये गाँव में रहती हैं.
बीबीसी से बातचीत में हौसाबाई पाटिल ने अपने पिता से जुड़े कुछ किस्सों का ज़िक्र किया.
हौसाबाई भले ही बूढ़ी हो गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़ में आज भी वो जोश बरकरार है.
उन्होंने बताया, "उन दिनों हम इस आंदोलन से जुड़े लोगों को आवश्यक हथियार मुहैया करवाते थे. मुझे सांगली ज़िले के भवानी नगर स्थित पुलिस स्टेशन में रखीं बंदूकों को निकालने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. भरी दोपहर में हथियार लूटना, किसी बाघ के मुँह में अपना हाथ डालने से कम नहीं था. लेकिन हमें वो काम करना ही था."
हौसाबाई के अनुसार, उस वक़्त उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अपने सभी सहयोगियों को उनकी जिम्मेदारियाँ समझाना था. जिस दिन लूट की ये कार्रवाई हुई, उस दिन हौसाबाई के नेतृत्व में ही कुछ लोग पुलिस थाने में दाख़िल हुए थे.
उन्होंने बताया, "हमारा एक सहयोगी मेरा भाई बनने का नाटक कर रहा था. उसने थाना परिसर में मुझे ये कहते हुए पीटना शुरू किया कि मैं अपने पति के घर वापस क्यों नहीं लौट जाती हूँ. उसने मुझे मारने के लिए हाथों में एक बड़ा पत्थर उठा लिया था. ये देखकर थाने में तैनात पुलिसवाले बीच-बचाव करने आ गये. वहाँ भीड़ जमा हो गई. और मौक़ा देखकर हमारे बाकी साथियों ने थाने से बंदूकें और कारतूस चोरी कर लिए."
हौसाबाई कहती हैं कि सभी आंदोलनकारियों का हौसला देखकर नाना पाटिल रोने लगे थे.
वो बताती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पत्री सरकार आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश सरकार को परेशान करने और उन्हें खदेड़ने के लिए कई नये तरीक़े निकाल लिये थे.
कभी वो पोस्ट हाउस जला देते थे. कभी रेलवे की पटरियों को तोड़ देते थे. कई बार टेलीफ़ोन की लाइनों को भी उखाड़ा गया था. इनमें से कई गतिविधियों को हौसाबाई के नेतृत्व में अंजाम दिया गया था.
हौसाबाई ने बताया, "क्रांति सिंह पाटिल अंत तक जंगलों में ही घूमते रहे. उन्होंने अपने जीवन के एक बड़े हिस्से में भूमिगत रहकर ही काम किया और उनकी 'समानांतर सरकार' ने स्वतंत्रता जीती. लेकिन आज भी एक सवाल जो हमेशा मेरे दिमाग़ में रहता है, वो ये कि क्या वाक़ई हम आज़ाद हैं? ये बड़े दुख की बात है कि देश में लोगों की भोजन और कपड़े जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं."
वर्तमान सरकार के बारे में बात करते हुए हौसाबाई ने कहा, "अगर मेरे पिता क्रांति सिंह नाना पाटिल आज जीवित होते, तो वो इस सरकार को तीन दिन से ज़्यादा चलने नहीं देते. वो इस सरकार की धज्जियाँ उड़ा देते."
हौसाबाई, क्रांति सिंह की अकेली संतान हैं. उन्होंने तीन साल की उम्र में ही अपनी माँ को खो दिया था.
उन्होंने अपने पिता के साथ भी बहुत कम वक़्त बिताया क्योंकि उनके पिता क्रांति सिंह देश की सेवा में उलझे हुए थे. लेकिन हौसाबाई मानती हैं कि इन्हीं परिस्थितियों ने उनके मन में भी देशभक्ति का बीज बोया.
पत्रि सरकार आंदोलन पर लिखनेवालों ने इस आंदोलन में हौसाबाई की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में काफ़ी लिखा है.
आंदोलन के दौरान गुप्त संदेश लाने, ले जाने के अलावा खाने-पीने की व्यवस्था करना, परिवहन का बंदोबस्त और प्रदर्शनों के आयोजन की अहम ज़िम्मेदारी भी हौसाबाई के पास ही थी.
इस बारे में हौसाबाई ने बताया, "गुप्त संदेश ले जाना सबसे मुश्किल काम हुआ करता था. पुलिस अधिकारी निरीक्षण में हमें पकड़ न सकें, इसके लिए हम अपने बालों में या चुटिया के भीतर कागज़ की चिट छिपाकर ले जाते थे. एक बार मुझे और मेरे साथी कार्यकर्ता को ब्रितानी अफ़सरों ने रोक लिया था. उन्होंने हमसे कई तरह के सवाल पूछने शुरू किये. हमारे पास एक अहम गुप्त संदेश था. हम उसे लीक नहीं होने दे सकते थे. इसलिए मैंने उस चिट को मौक़ा देखकर चबा लिया. उस वक़्त, इसके अलावा बचने का कोई और तरीक़ा ही नहीं था."

Wednesday, August 15, 2018

被政府盯上的穹顶 宁夏韦州清真大寺对峙事件原委

国西部的宁夏回族自治区同心县,数百名穆斯林与当地政府对峙,以保护当地的清真寺不被拆除。
有官员表示,新落成的宁夏韦州清真大寺没有获得适当的建筑许可证。
但信众拒绝退缩, 一位居民表示他们“不会让政府碰清真寺”。
中国是大约2300万穆斯林的家园,几个世纪以来,伊斯兰教在宁夏一带占据主导地位。
但人权组织表示,中国官方对待穆斯林的敌对情绪越来越多,特别是有外国宗教影响的情况下。
面临被拆毁风险的这座清真寺以中东风格建造,有九个洋葱头形状的圆顶、伊斯兰特有的星月标志以及四座用于穆斯林祷告的尖塔。
有媒体报道称,北京将此视为中国穆斯林人群伊斯兰化和阿拉伯化的代表,对这种趋势感到非常担心,同时正采取手段使这些宗教走向“中国化”。
资料显示,这座清真寺建筑于去年完工。它取代的是一座古老中式清真寺的复制品——拥有600年历史的韦州老清真寺在中国文革中被损毁。
据路透社报道,该通知在当地回族穆斯林的社交网络上被广泛分享和传播。
根据《南华早报》报道,这次政府行动遭到广泛质疑的一点是,如果没有取得相关许可,当局为何没有在清真寺建造过程中叫停,却在两年工期完成后才决定拆毁。
抗议活动于周四在清真寺外进行,并持续至周五。在中国社交媒体上传播的照片显示,庞大的人群聚集在巨大的白色清真寺周围。
一位居民表示,当地回族群众与政府之间的谈判陷入僵局。
“我们现在处于对峙状态,”一名不愿透露姓名的居民告诉媒体。 “大家不会让政府碰清真寺的,但政府也不会退缩。”
目前尚不清楚,原本计划在周五开始的拆除是否执行,或者是否双方达成妥协。
该县伊斯兰协会的一位官员表示,清真寺不会被完全拆除。他告诉路透社,政府只希望建筑结构“翻新以减少其规模”。
到目前为止,中国官方媒体对此案没有任何评论。驻北京记者麦笛文()分析称,数百年来中国的回族穆斯林清真寺建筑风格都比较倾向中式建筑。但这次发生对峙的韦州清真大寺拥有四个宣礼塔和九座圆顶,似乎被当地政府视为中国穆斯林人群阿拉伯化的标志。政府因此宣布,建筑许可中的条款没有得到执行。

Tuesday, July 31, 2018

全球中国对话:聚焦可持续发展及气候变化

本报讯 记者高健 12月2日,来自中英两国的五十多位研究气候变化相关课题的专家及研究人员聚集在英国学术院,探讨可持续发展及全球气候治理。
在由全球中国比较研究会、伦敦国王学院中国研究院、威斯敏斯特大学中国传媒中心等机构联合主办的“第三届全球中国对话”上,围绕中国在解决气候变化上所扮演的角色,媒体对这一话题的报道倾向以及全球治理的问题,与会者进行了广泛的讨论。
以结构化理论闻名的当代著名社会学家、伦敦政经学院前校长安东尼·吉登斯教授在主旨发言中谈到了当今的全球政治形势下,气候变化问题所面临的巨大的挑战,尤其提到技术和社会的快速发展的影响。中国人民大学副校长洪大用教授也提请听众关注中国现代化转型的环境约束,特别是关注应对气候变化政策实践的社会复杂性。
当天会议围绕四个板块进行了分别讨论,值得注意的是,社会科学学者试图以语料库为资源,来分析媒体是如何建构气候变化相关的话语。这些研究显示,不同的媒体在气候变化问题上的报道会有不同倾向,这取决于媒体自身的价值观,也取决于各媒体的背景。
在当天的会议上,多名参会者都提及美国候任总统特朗普对气候变化的态度。自从媒体报道特朗普放言气候变化是中国为了搞垮美国制造业而炮制的“谎言”,并扬言上任后将取消巴黎气候协定后,气候变化问题就以一种令人意料不到的方式成为一个大众话题,并引起广泛的忧虑。
在这次会议举办前一天,《独立报》报道,最新的研究表明,全球气候变暖的速度超出预计,已经处在无法回头的地步,到2050年,地球气温将上升一度。领导这项研究的克鲁泽博士(Dr.  Crowther)表示,全球变暖的结果已无法挽回,但人类可以试图削弱它的效应。
“全球中国对话”是由常向群教授领导的全球中国比较研究会所组织的年度系列活动,旨在聚合中西方学者和意见领袖,从跨学科和比较的视野,提高公众对当前全球事务和共同感兴趣的话题的理解。今年是第三次对话,除了2日的会议之外,12月3日,该会还携手复旦大学当代社会生活资料研究中心及浙江传媒学院话语与传播研究中心继续就语料库与社科研究举办了工作坊,发掘语料库方法在中国社会科学研究中的更广泛应用。

福克纳教授、查尔斯·格兰特先生、项晓炜先生从治理角度围绕回顾巴黎协议进行探讨,卡门·戴雷尔、迈克·斯科特、钱毓芳、王芳等用基于语料库的话语研究方法对媒体关于气候变化相关的话语建构展开了讨论。丹尼斯·帕姆林先生以中国的角度展望了2030年后全球治理的合作方式和提出进行全球可持续性、科学的领导方式。张乐天教授以浙北海宁盐官地区为例,呼吁重视中国乡村的环境问题。英国肯特大学张悦悦博士讨论了中国可持续性理念的社会吸收,关注中国社会潜在的全体心态。

威斯敏斯特大学达雅·屠苏教授以及武汉大学罗教讲教授等发表闭幕式发言。活动的主要组织者、全球中国比较研究会会长常向群教授进行闭幕总结,本次会议旨在将中国关于处理气候变化研究和思想与西方学者的相关研究联系起来,为人类共同发展做出贡献。
当晚,第三届全国中国对话会议招待会于英国议会大厦举行。英国政府国际发展部国务大臣麦克·贝茨勋爵、英国经济社会研究委员会研究主任托尼·麦肯勒里及威斯敏斯特大学副校长克斯廷·梅伊教授分别致辞,学无国界myOffer管理合伙人Amanda Wang在招待会上发表讲话。
12月3日,作为第三届全球中国对话的延伸版块——中国社科研究工作坊在伦敦国王学院顺利举办。随着跨学科意识的提高,语言学方法,如基于语料库的话语,已应用在社会学、人类学、民族学、文化研究、心理学、认知科学、计算机科学等等。这也是此次工作坊的重要意义。旨在搭建一个平台,供中国人和非中国人通过对话的方式探讨与这些问题相关的话题,如发。展、教育、经济、移民、家庭、环境、公共卫生、人类安全以及全球治理。
第三届全球中国对话由全球中国比较研究会、全球青年企业家协会、英国威斯敏斯特大学中国传媒中心及英国伦敦国王学院中国研究院联合主办,由学无国界myOffer、UVIC英国教育签证中心赞助。